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आजम को निपटाना चाहते हैं मुलायम !


उत्तर प्रदेश में नई नवेली अखिलेश सिंह यादव सरकार के सामने नई मुसीबत पैदा हो गई है। बीच चुनाव में लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने और भारतीय जनता पार्टी को मुकाबले में लाने की गरज से समाजवादी पार्टी जिन शाही इमाम अहमद बुखारी को गाजे-बाजे के साथ अपने साथ लाई थी अब वही इमाम साहब सपा से मुसलमानों का हक़ मांग रहे हैं। जाहिर है चुनाव में वादे करना और उसके बाद ईमानदारी से किसी का हक़ अदा करना अभी हमारे राजनेताओं की फितरत नहीं बन पाई है सो सपा सकते में है।
कहा जा रहा है कि इमाम बुखारी अपने हारे हुए दामाद मुहम्मद उमर के लिए लालबत्ती और अपने भाई के लिए राज्यसभा की सदस्यता मांग रहे हैं ताकि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को उनका वाजिब हक़ मिल सके !!! बात सही भी है जब समाजवादी पार्टी चुनाव के दौरान कह रही थी कि इमाम साहब के साथ आ जाने से अब उत्तर प्रदेश का मुसलमान पूरी तरह उसके साथ आ गया है तो अब जब उसकी सरकार बन गई है तो वह मुसलमानों को उनका हक़ क्यों नहीं दे रही है ? यानी पार्टी ने जो कांटें सिर्फ अपने नेता आज़म खां को डराने और चुनाव का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने के लिए बोए थे उनकी फसल काटे जाने का वक्त नज़दीक आ गया है। हालांकि इमाम साहब के दामाद साहब की चुनाव में जमानत जप्त हो गई थी और जिस सीट पर वे लड़ रहे थे उस सीट पर मुसलमानों की संख्या लगभग अस्सी फीसदी बताई जाती है।
लुप्त प्राय हो चुके इमाम साहब को मुलायम सिंह लाए ही इसलिए थे कि यूपी चुनाव में ये सन्देश जाए कि लड़ाई अब बसपा और सपा की नहीं बल्कि भाजपा और सपा की है। इसमें वो काफी हद तक कामयाब भी रहे और भाजपा मजबूत हो रही है इसी अंदेशे में मुसलमान एकतरफा सपा को मिला। वरना जिस दिन भाजपा राम मंदिर बनाने और गाय बांटने का ऐलान करती है ठीक उसके बाद ही इमाम साहब नमूदार क्यों होते हैं? उसी समय तय हो गया था कि ये मैच फिक्स है। वरना यह महज एक संयोग नहीं था कि जब सूबे में डूबती हुई भारतीय जनता पार्टी को अपनी नैया पार लगाने के लिए एक बार फिर राम मंदिर का निर्माण याद आया ठीक उसके अगले ही दिन इमाम साहब को मुलायम सिंह मुसलमानों के हितैषी नजर आने लगे थे! यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि अतीम में मुलायम सिंह सूबे की सियासत में उरूज पर तभी रहे हैं जब भाजपा मजबूत रही है और भाजपा के कमजोर पड़ने पर उनकी सियासत भी कमजोर पड़ती रही है। इसलिए सपा का सोचना था कि अगर बुखारी के आने से पैदा होने वाले सांप्रदायिक तनाव से भाजपा को फायदा होगा तो उसके रिएक्शन में मुसलमान उसे वोट करेंगे और मायावती चित्त हो जाएंगी। हुआ भी ऐसा ही।
अब कहा जा रहा है कि इमाम साहब सौदेबाजी कर रहे हैं। अगर ये आरोप सही हैं तो वे क्या गलत कर रहे हैं? मुलायम सिंह जी चुनाव समाप्त होते ही हर सौदे को अब नकार क्यों रहे हैं? क्या गलत कह रहे हैं इमाम कि नौ प्रतिशत यादव और अठारह फीसदी मुसलमानों के गठबंधन से सपा राज कर रही है तो उन्हें उनका हक दो ! जब हक की परिभाषा यही तय होगी तो भाई दो हक ? किसने तय की थी हक की ये परिभाषा ? मुलायम सिंह और समाजवादी पार्टी भी तो ये परिभाषा तय करने वालों में ही शरीक थे! कांग्रेस ने जब पिछड़ों के आरक्षण में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का दांव चला था तब मुलायम सिंह यादव और सपा को बहुत बेचैनी हो गई थी और उस समय तो वे कह रहे थे कि मुसलमानों को अठारह फीसदी आरक्षण देंगे। अब क्यों उस वादे को भूल रहे हैं? अगर बुखारी उन्हें उनके वादों की याद दिला रहे हैं तो ये क्यों कहा जा रहा है कि इमाम सौदेबाजी कर रहे हैं? इमाम तो सिर्फ जो सौदा चुनाव पूर्व हुआ था उसके तहत हिस्सा मांग रहे हैं। अठारह फीसदी मुसलमानों के बल पर सत्ता सुख भोग रही समाजवादी पार्टी अगर मंत्रिमंडल में मुसलमानों को भी उचित प्रतिनिधित्व नहीं दे पाती है तो कम से कम राज्यसभा और विधान परिषद में ही अपने तीन चैथाई उम्मीदवार मुसलमान बना देती! अब अगर बुखारी अपने दामाद के लिए लाल बत्ती और भाई के लिए राज्यसभा की सदस्यता मांग रहे हैं तो इसमें सपा को गलत क्यों लगता है? इमाम का हक़ इस मसले में जया बच्चन या विधानसभा चुनाव हार चुके और मंत्री बनाए गए दो यादव नेताओं बलराम यादव और अंबिका चैधरी से तो ज्यादा ही बनता है। फिर सपा नेतृत्व ने ही चुनाव के दौरान कहा था कि इमाम के साथ आने से सारा मुसलमान उनके साथ आ गया तो क्या अखिलेश सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव को उनका एहसान नहीं उतारना चाहिए?
मज़े की बात यह है कि जिन इमाम साहब को साथ लाने की अहम वजहों में से एक वजह यह भी थी कि आज़म खान को यह संदेश देना था कि अखिलेश की राह में रोड़ा न बनना वरना मुलायम सिंह की झोली में एक इमाम भी है, आज उन्हीं आज़म को सपा इमाम से भिड़ने के लिए आगे कर रही है। सपा नेतृत्व भी इस बात को तो बखूबी जानता है कि आज़म खान तो पार्टी के वफादार हैं और जब पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था उस वक्त भी वे किसी अन्य दल में नहीं गए लेकिन इमाम साहब सपा के वफादार थोड़े ही न हो जाएंगे। दूसरे आज़म खान को इमाम से भिड़ा दो तो आज़म और इमाम दोनों ही ढेर हो जाएंगे और सपा मौज करेगी। लगता है पार्टी के संकट को आज़म बनाम बुखारी का रूप देने में सपा के शीर्ष नेतृत्व का ही हाथ है क्योंकि बुखारी से जिन दो मंत्रियों ने संपर्क किया बताया जाता है वे सपा महासचिव रामगोपाल यादव के बहुत ही नज़दीकी बताए जाते हैं और रामगोपाल यादव आजकल मुख्यमंत्री के मास्टरमाइण्ड की भूमिका में हैं।
अब कुछ लोग इमाम और आजम खान को एक तराजू में तौलने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन आजम और इमाम का अंतर समझना पड़ेगा और दोनों का सामान्यीकरण करने के खतरे हैं। तमाम मजहबी गोलबंदी के बावजूद अगर शाही इमाम और उन जैसे धर्मगुरुओं को उनकी हदें याद दिलाने का काम अगर किसी व्यक्ति ने हिन्दी पट्टी में किया है तो वो शख्स आजम खान ही हैं। 1993 में भी आज़म खान ने ही ललकार कर कहा था कि इमाम साहब इमामत करें और सियासत हमें करने दें। इतना ही नहीं जब पिछली सपा सरकार के समय हाजी याकूब कुरैशी, पैगंबर हज़रत मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाले काटूर्निस्ट का सिर कलम करने वाले को इनाम देने का फतवा जारी कर रहे थे उस समय भी आज़म खान ने ही बहुत तंज में कहा था कि फतवा देने का अधिकार सिर्फ नेक चेहरा रखने वाले को नहीं है। उस समय भी उनका इशारा साफ था कि धर्म और सियासत को गड्ड-मड्ड मत करो।
एक अन्य महत्वपूर्ण बात, आजम खान ने इस मिथक को भी तोड़ा है कि मुसलमानों के रहनुमा मुसलामानों की तालीम के बारे में नहीं सोचते। मौलाना जौहर यूनिवर्सिटी कोई छोटा मोटा और गैर जरूरी प्रोजेक्ट नहीं है। आजम खान के इस योगदान को तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद स्वीकार करना पड़ेगा। इस यूनिवर्सिटी का असल योगदान तो आज से बीस साल के बाद नज़र आना शुरू होगा। क्या आज़म खान के अलावा हिंदी पट्टी में किसी अन्य मुस्लिम सियासतदां का नाम लिया जा सकता है जिसने शिक्षा के विषय पर इतना गंभीरता से कदम उठाया हो? कहने को सलमान खुर्शीद भी उत्तर प्रदेश के नेता हैं, खानदानी रईस भी हैं और मुसलमानों के आरक्षण के सवाल पर चुनाव आयोग से पंगा लेने और फांसी पर चढ़ने के लिए भी तैयार रहते हैं लेकिन यही सलमान देश भर में अभिजात्य वर्ग के पब्लिक स्कूल ”दिल्ली पब्लिक स्कूलों“ के प्रबंधतंत्र से तो जुड़े हुए हैं लेकिन किसी आम मुसलमान की शिक्षा के लिए उनका कोई शिक्षण संस्थान नहीं है।
अब इमाम कह रहे हैं कि आजम को सारा मुसलमान अपना रहनुमा नहीं मानता है और उनकी रामपुर के बाहर हैसियत नहीं है? लेकिन इमाम साहब की इस बात में भी दम नहीं बल्कि दम्भ है कि आजम की रामपुर के अलावा कहीं हैसियत नहीं है? अगर ऐसा ही है तो इमाम साहब, आज़म खां का मुरादाबाद से मेयर का चुनाव लड़ने का चैलेंज स्वीकार क्यों नहीं कर लेते?
अमलेन्दु उपाध्याय

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