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'जो प्यार से नहीं मानते उन्हें डराना पड़ता है'


जहां हर तरफ, खास तौर पर महिलाओं में, वजन कम करने की होड़ लगी रहती है, अच्छी खासी सेहत वाली परमजीत कौर अपने वजन से संतुष्ट हैं. उनका तर्क शायद जायज भी है. वे कहती हैं, ''अगर मैंने अपना वजन कम किया तो मुझे यह काम नहीं मिलेगा. कौन डरेगा मुझसे?'' दरअसल छोटे कद की लेकिन हट्टी-कट्टी परमजीत कौर चंडीगढ़ के एक नाइट क्लब में बाउंसर हैं. उनका कहना है कि उनका काम एक तरह से डराने का ही तो है--वो एक नाइट क्लब में बाउंसर हैं.
उनका कहना है कि महिलाएं कोई भी काम कर सकती हैं.

आम तौर पर आप पुरुषों को नाइट क्लबों में बाउंसर का काम करते हुए देखते हैं लेकिन अब कुछ महिलाएं भी ऐसी जगहों पर माहौल खराब करने वाले लोगों को काबू में करने का काम करने लगी हैं. 30 वर्षीय परमजीत कौर उन गिनी-चुनी महिलाओं में से एक हैं. इससे पहले कि चंडीगढ़ के सेक्टर 26 में 'कावा' नाम के इस नाइट क्लब पर लोग आना शुरू करें, परमजीत कौर लगभग साढ़े सात बजे ही यहां पहुंच जाती हैं. सुबह के लगभग तीन बजे तक चलने वाले इस काम के बारे में वे बताती हैं, ''मेरा काम यहां पर महिलाओं की चैकिंग करना है. ये देखना होता है कि वो पी कर कोई ऐसी वैसी हरकत न करें. अगर प्यार से मानती हैं तो ठीक है नहीं तो मारना भी पड़ता है.''
छोटे शहर से
हमने पाया कि हर मेहमान पर वे पैनी नजर रखती हैं. कपड़े, पर्स और बैग तो देखती ही हैं, साथ ही मोजे, जूतों पर भी हाथ मार कर अंदाजा लगाती हैं कि कहीं कोई शराब की छोटी बोतल या कोई हथियार अंदर न जा पाए. परमजीत पंजाब के एक छोटे शहर मोरिंडा से हैं. पास ही के एक कस्बे बस्सी पठाना में शादी हो गई. अपने परिवार में काम करने वाली वह पहली महिला हैं. और फिर ऐसा काम जिसमें रात भर बाहर रहना पड़ता है. घर की बाकी महिलाओं को इस पर ऐतराज होना स्वाभाविक है. वे कहती हैं, ''परिवार में कुछ महिलाएं हैं जिन्हें अब भी इस पर ऐतराज है. मैं उनका नाम नहीं लूंगी लेकिन वे कहती हैं कि रात को बाहर रहती है, बच्चों को घर पर छोड़ देती है, पता नहीं क्या करती हैं, क्या नहीं.'' लेकिन अपने परिवार वालों को नाराज करने के लिए परमजीत यह काम नहीं करती. वे बताती हैं, "पैसे की जरूरत थी. मेरे दो बच्चे हैं जो स्कूल जाते हैं. उनका पालण पोषण भी करना है. यह ऐसा काम था जिसमें मुझे एक शाम में 700-800 रुपए मिल जाते हैं.''
शुरुआत में मुश्किल
दिन में वह एक स्कूल में सुरक्षा गार्ड का काम करती हैं. यानी दिन में यह देखती हैं बच्चे अनुशासन में रहें और रात में वयस्क. वे कहती हैं, "बाउंसर का काम करना पहले मुश्किल जरूर लगा. 10-12 पुरुषों में अकेले काम करना मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी. लेकिन लेकिन अब कोई शिकायत नहीं है.'' उनका कहना है कि अब उन्हें लगता है कि महिलाएं कोई भी काम कर सकती हैं. परमजीत कहती हैं, ''आज की दुनिया में जब लोग अपनी लड़कियों को बोझ समझते हैं और यहां तक कि मार भी देते हैं वो यह समझ ही नहीं पाते कि महिलाओं ने कितनी तरक्की की है. मुझे बहुत खुशी है कि मैं इतना कुछ होने के बावजूद ये सब कुछ कर पाती हूँ. दरअसल महिलाएं अपने बच्चे भी संभाल सकती हैं और खुद को भी.'' परमजीत बताती हैं कि कई बार तो महिलाओं से हाथापाई की नौबत भी आई है. ''लेकिन अब न तो डर लगता हैं न ही कुछ अजीब.'' और फिर वे अपनी वर्दी को ठीक करते हुए काम में जुट जाती हैं.
अरविंद छाबड़ा

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